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बचपन के वो दिन और वो बचपन के यार कहाँ गये ! बचपन के वो दिन पता नही कहाँ चले गये , मस्ती भर रहते थे वो यार कहाँ चले गये | बिना मिलावट के थे वो यार कहाँ चले गये , बचपन के दिन अपने हाथ से केसे निकल गये

 बचपन के वो दिन और वो बचपन के यार कहाँ गये ! बचपन के वो दिन पता नही  कहाँ चले गये , मस्ती भर रहते थे वो यार कहाँ चले गये | बिना  मिलावट के थे वो यार कहाँ चले गये , बचपन के दिन अपने हाथ से केसे निकल गये , रहते थे दिन भर मस्त , ना था चवन्नी -अठन्नी हाथ में , फिर भी खुशी की लहर थी , पता नही बचपन के यार वो कहा चले गये , बचकनी यादे कहाँ बीत गई || दिन थे मजे के , और फ्री वाले यार कहाँ चले गये | रहते थे खुश अपनी ही जिंदगी में , ना फालतू लोगो से लगाव था , ना अपने घर में  किसी से बैर था , सुबह उठ जाते थे , बस एक चाय के कप से , ताकत थी उस मां के लाड में , पर वो दिन पता नही कहाँ चले गये , दोडते दोडते घर आते थे , मां- मा कहकर गोद में बैठ जाते थे | फिर उठकर घर से भाग जाते थे , पता नही वो बचपन के दिन कहाँ चले गये | पता नही वो बचपन के यार कहाँ चले गये || स्कूलों में घंटी बजती थी टन टन , तब कापती थी धडकन सबकी , कब स्कूल की छूटटी वाली घंटी बजेगी , याद रहती थी , बचपन में वो मास्टर की मार , कापता था मेरा भी वो जिगरी यार  जब कापी चैक होती थी उसकी बार बार  || पर पता नही अब वो य...