मुझे आशिकी नही आती , मुझे निभाना आता हे | मुझे गिरना नही है और मुझे किसी को गिराना भी नही || बात कम करता हू , पर मुझे छूपाना नही आता | घर की हर बात याद है मुझे , तेरी बाहौ में मुझे अब चैन नही आता | मुझे आशिकी नही आती | मुझे निभाना आता है | मुझे तो बस समझाना आता हे | गलत आदमी से बात नही | बस गलतियों से सिखना आता हे | सच बताऊ मुझे आशिकी नही आती | काहानी लिखी है मैने मेरे कलमो से , काहानी लिखी है मैने मेरे कलमो से , किसी की फालतू कहनी नही आती | मुझे गिरना नही और गिराना भी नही आता , बात कम करता हू , पर छूपानी नही आती | मुझे आशिकी नही आती | सच में काहानी तो लाखो लिख दू , पर झूठी मुठी बाते कहनी नही आती || पर मे तेरे जैसे का जिक्र नही करता | पर मे तेरे जैसे का जिक्र नही करता | तू सच हो या झूठ , मुझे बताना नही आता , मे आशिकी नही करता , में समझता हू हर बात | किसी को गलत कहना नही आता | मुझे आशिकी नही आती , मुझे निभाना आता हे | मुझे गिरना नही है और मुझे किसी को गिराना भी नही आता , बात कम करता हू , पर छूपाना नही आता | मुझे आशिकी नही आती , मुझे न...
365 दिन की दिन की वो राते याद हे मुझे 365 दिन की वो राते , तनहाई में कटी थी वो दिन की राते , रोकर भी अपने आप को चुप कराई की थी बाते ,
365 दिन की दिन की वो राते याद हे मुझे 365 दिन की वो राते , तनहाई में कटी थी वो दिन की राते , रोकर भी अपने आप को चुप कराई की थी बाते , कोई नही अगले दिन तो होगा ना सवेरे ये कहकर बस पलके थी ना समेटी , याद तो हे ना तुझे भी मेरी वो तनहाई वाली राते , सुबह उठकर देखा था ,तो पलके तो थी ही वैसे पर टपकी की आंखे , कहती थी चल पडता हू में , कहती थी चल पडता हू में , ये कहकर वो मेरी आंखे , याद तो हे तुझे मेरी 365 दिन की वो राते , याद हे तुझे मेरी 365 दिन की , चीख वाली राते , कहकर अब चला हू , हर काहानी में अपना दर्द लिखा हू , ना किसी से कहू बस , अपने आप को लिखता हूँ , ना किसी से मदद ली , ना किसी का बुरा भला किया | अपनी ही रातो में कटी थी तनहाई की राते , बदले -थे -बदले अपने वो सलिके , हर कदम पर ठोस मिला हू , तनहाई में इतना दर्द सहा हूँ , ना किसी को गलत कहा, ना किसी की अपमानित किया हू , बस अपनी लाईन में चला हू | हर काहानी में मैने बहुत दर्द लिखा है | कदम- कदम पर अपना काम और नाम लिखा हे | ना किसी से की गैरौ वाली मोहबबते, बस अपनी नियति ...