एक पुरूष थकता नही |
एक पुरूष थकता नही है |
उसे थकाया जाता है |
वो हारता नही पर उसे हराया जाता है |
वो रोता नही है पर रूलाया जाता है |
तू एक मर्द है ये कहकर चुप कराया जाता है |
घर की सारी जिम्मेदारी दिया जाता है |
एक आंसू कया टपका दो किसी के पास ,
औरत है कया तू ये कहा जाता है |
एक मर्द है तू ये समझाया जाता है |
सब जिम्मेदारी का एहसास दिलाया जाता है |
कमाना भी तू तुझे है |
घर भी तुझे ही चलाना है |
ये कहकर एक मर्द को हराया जाता है |
एक पुरूष थकता नही है ,
पर फिर भी उसे थकाया जाता है |
तुझे पढकर आगे जाना है |
कही कलम की नौकरी तो कही मजदूरी करवाया जाता है |
एक मर्द थकता नही ,
पर फिर भी परिवार के तानो से थकाया जाता है |
ये तो सब देखा हुआ है ,
तू कया अलग घूमाया मुझे
ऐसे ऐसी जगह तो घुमी हुई है |
कहकर लोगो को भी सुनाया जाता है |
अपने आप को बडा मानते है लोग ,
जिनकी जेब नही है दस से ज्यादा कया नोट
कहकर ये लोगों को बढाया जाता है |
अकसर जिन्हे देखी ही नही मेहनत की वो राते ,
वो अकसर रातो रात खबाबो के सपने सजाते है |
मर्द थकते नही उन्हे थकाया जाता है |
ये कह कहकर घर तेरे हाथ में है आगे तुझे चलाना है |
मर्द को रूलाया जाता है |
अकसर मर्द दूसरो के तानो से नही बल्कि घर के ही
कलेशो से जलाया जाता है |
लिखता है ये अनिल हटरिया बहुत सारी कहानियां ,
अपने दिल से और ना किसी का दिल दुखाया करता है |
में एक मर्द हू ,
पर एक इंसान के नाते ना किसी को रूलाया करता हूँ |
जिनको पंसद नही है मेरी मर्द वाली दुनिया ,
उनको को दिन रात में जलाया करता हूँ |
एक पुरूष हूँ , थकता तो नही हू ,
पर थकाया जाता हूँ |
काहानी तो में लाखो लिखू पर सच में तो ये है
कि हर घर मे एक मर्द तो थकाया जाता है |
ना जाने कया उममीदे लगाते है |
गिरे हुऐ लोग एक मर्द को गिराने की ,
सच तो ये है मर्द ना झुकता है ,
ना तुडता है ,ना थकता है ,
ना गिरता है ना गिराता है ||
ना हारता है ,ना ही अपने आप को हराने की ,
एक पुरूष थकता नही |
एक पुरूष थकता नही है |
बस उसे थकाया जाता है |
लोगो दवारा गिराने की ,
एक पुरूष थकता नही |
उसे थकाया जाता है |
उसे थकाया जाता है दबाने के लिऐ |||
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