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एक शाम थी , हार थक के घर आ जाती थी | पता नही चलता था कि रात कटी या दिन , मन बहुत घबराता था | दिल को बहुत सताती थी | पता नही रात कयू आ जाती थी ,

 एक शाम थी ,


एक शाम थी ,  हार थक  के घर आ जाती थी |  पता नही चलता था कि रात   कटी या दिन ,  मन बहुत घबराता था |  दिल को बहुत सताती थी |  पता नही रात कयू आ जाती थी ,


हार थक  के घर आ जाती थी |

पता नही चलता था कि रात 

कटी या दिन ,

मन बहुत घबराता था |

दिल को बहुत सताती थी |

पता नही रात कयू आ जाती थी ,

जिंदगी कयू रो जाती थी |

आते थे सपने थके थके 

फिर भी मन को कयो भा जाते थे |

रास नही आया तुझे 

तो फिर मुझे कयो पाने की सोची थी ,

हर शाम आती थी ,

थकी थकी मुझे रोने को कर जाती थी ,

खोये नही महफिलो में ,

फिर भी ये कयू चली जाती थी |

हर एक शाम आती थी |

कुछ पल सताती थी |

आंखो मे दर्द की परत थी |

कभी कभी तो ऐसी 

शाम आती थी ,

दिल चाह कर भी नींद 

नही आती थी |

मेरी एक शाम आती थी ,

कभी बुखार तो कभी दर्द ,

और 14 तरह की बिमारी एक साल में 

आ गई थी ,कैसे शाम निकले 

एक साल की ,

हर महीने कुछ नई 

दिककत आती थी ||

मां आई रोटी बनाने के लिऐ 

पर वो शाम नही जाती थी |

चाय पीकर  मां की दौड लगती थी ,

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कभी बलले उठाकर कमरे में उठ जाती थी ||

उममीद बहुत थी पर 

शाम वही बात याद आती थी ,|

मासूम सी जिंदगी बनी थी 

कभी कभी तो शाम 

दिखते ही हाथ कांप जाती थी ||

पल पल याद है मुझे ,

पर आंखो की बिमारी ही नही ,साथ साथ 

सांस लेने में दिक्कत आती थी ||

किसी से कयो बोलू में जब 

दिल शाम देखकर डर जाता था||

कभी तो हार थक आया था ,

अपनी नौकरी के परोमोशन में पढने लग जाता था ||

हर शाम कुछ नया आता था ||

हर जिंदगी का मोड मुझे सिखाता था ||

लगे रहे दिन में बहुत ,

पर शाम आते ही दिल रो जाता था ||

हर काम को अचछा किया |

बस शाम आने का इंतजार ना किया |

बीते पल से बहूत सिखा ,

बीते पल ने बहुत समझाया ,|पर 

दिल ने बस ही बात बोली 

आल ईज वल आल इज वल ,

शाम का वो दोर अब कभी ना आऐ |

कभी आंख रोये वो पल ना आऐ ,

मेरे ताऊ देवता खयाल रख ,अब

वो वाला दौर दौबारा ना आऐ ,

ना चहिऐ मोहब्बत ना चहिऐ प्यार ,

बस अब जिंदगी की वो शाम ना आऐ ,

झूठे लोग मेरे आंखो के आगे ना आऐ |

एक शाम थी ,

वो लौट के ना आऐ ,

अब सिख लिया जीना ,

ना किसी के लिऐ मरना ,

ना वो हर शाम मेरे आगे कभी ना आऐ ||

दिल से गुजारिश वो शाम ना आऐ |

वो शाम ना आऐ |

एक शाम थी ,

हार थक  के घर आ जाती थी |

एक शाम थी ,

हार थक  के घर आ जाती थी |


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✍🏻✍🏻✍🏻 अनिल हटरिया


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