तुझे जाना कही था
और हमे आना कही था |
गुलदस्ते देना था पर
कांटे की डालो को छुना नही था |
हँसना भी बहुत था ,
पर तेरे सामने रोना बिल्कुल नही था |
डाल मुरझाई हुई को टोडना बिल्कुल ही नही था ,
चलते - चलते सफर में गिरना बिल्कुल नही था |
ठोकरे लगते- लगते सभंलना बहुत जरूरी था ||
जाना था जिसको जहाँ के रास्ते
वहा पर उसको रोकना मेरा काम नही था ||
पर तुझे जाना कही था ,
और मुझे आना कही था |
ना समझा सका ये कहना ,
मेरे लिऐ , शब्द थोडा सा अनकाना था |
मिल सके हम अपने आप से ,
ये सपने तो बहुत से दिन और रातो में
आते थे , तोल मोल के डोले ||
मस्ती से मन खोले ,
बिना डर के प्यार से बोले ,
कह दे अपनी बात ,
नही रहना अब बस तेरे साथ ,
दूर हो जाते बिना कुछ बोले
और कह देते जिसको
कहना था,
पर जिसको आना था ,
तो फिर उसे जाना कयो था ,
लगन लगी थी बस जीने की ,
तो मरने की कयो सोची थी |
तकरार कया है ये दिल को बताना
भी जरूरी था |
जिसको दिल की बात बताऐ ,
उससे फिर शर्माना कयो था |
किताब खोली थी बहुत डरते- डरते ,
पर किसी को यहाँ पर दिल से प्यार ही कहां था |
मिल जाऐ ये फ्री मे पूरी तनख्वाह ,
काम बिलकुल भी नही ,करना
काम करे कोई ,पर उनका रिश्ता गैरो से था ||
तुझे जाना कही और था ,
और हमे आना कही और था |
जोरो सोरो से मेहनत करी बहुत थी ,
पर लोगों की तिरछी आँखो को ,
हमने समझा कम थी |
हर- पल की कौन बताऐ ,
दिन का हाल कौन सुनाऐ ,
मजबूर करके लोग हमें कयो सताऐ ,
जब जाना जिसको अपनी - अपनी जगह ,
फिर वो गैरौ से कयो बतलाऐ |
दिखता है पल उस अंधे को भी ,
जब अंधेरे मे भी उसे कोई रोशनी ना दिखाऐ ||
पर तुझे जाना कही था
और हमे आना कही था |
पूरी तरह से समझ चुके उस मानव को ,
अब रूलाना बहुत मुशिकल था ,
कयोकी जिसको जाना कही था ,
फिर हमें भी उसके साथ आना कयो था |
गदार बनकर दिखाऐ हमे वो अपने ये दिन ,
बिन बात के झूठे जुलूस बढाऐ और ये
तान और मान को पीछे छोडकर
अपने आप को बडा दिखाऐ ,
फिर हम उसे गले कयो लगाऐ ,
फिर जिसको जाना कही ,
था और हम फिर उसे हाथ जोडकर बनाऐ कयो ,
अकड वालो को हम ज्यादा समझाऐ कयो ,
जिसको जाना उसे हाथ खींचकर रूकाऐ कयो ,
तुझे जाना है जाऐ
हम फिर कयो भागे आए
हम फिर कयो भागे आए ,
तुझे जाना कही था तो
और हमे तेरे पीछे आऐ कयो |
तुझे जाना कही था
और हमे आना कही था |
तुझे जाना कही था
और हमे आना कही था |
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