365 दिन की दिन की वो राते याद हे मुझे 365 दिन की वो राते , तनहाई में कटी थी वो दिन की राते , रोकर भी अपने आप को चुप कराई की थी बाते ,
365 दिन की दिन की वो राते
याद हे मुझे 365 दिन की वो राते ,
तनहाई में कटी थी वो दिन की राते ,
रोकर भी अपने आप को चुप कराई की थी बाते ,
कोई नही अगले दिन तो होगा ना सवेरे ये कहकर
बस पलके थी ना समेटी ,
याद तो हे ना तुझे भी मेरी वो तनहाई वाली राते ,
सुबह उठकर देखा था ,तो पलके तो थी ही वैसे
पर टपकी की आंखे ,
कहती थी चल पडता हू में ,
कहती थी चल पडता हू में ,
ये कहकर वो मेरी आंखे ,
याद तो हे तुझे मेरी 365 दिन की वो राते ,
याद हे तुझे मेरी 365 दिन की ,
चीख वाली राते ,
कहकर अब चला हू ,
हर काहानी में अपना दर्द लिखा हू ,
ना किसी से कहू
बस ,
अपने आप को लिखता हूँ ,
ना किसी से मदद ली ,
ना किसी का बुरा भला किया |
अपनी ही रातो में कटी थी तनहाई की राते ,
बदले -थे -बदले अपने वो सलिके ,
हर कदम पर ठोस मिला हू ,
तनहाई में इतना दर्द सहा हूँ ,
ना किसी को गलत कहा, ना किसी की अपमानित किया हू ,
बस अपनी लाईन में चला हू |
हर काहानी में मैने बहुत दर्द लिखा है |
कदम- कदम पर अपना काम और नाम लिखा हे |
ना किसी से की गैरौ वाली मोहबबते,
बस अपनी नियति पर चला हूँ |
अपनी -अपनी पगडी की इज्जत रखी ,है
लोगो को कया कहू ,
मैने तो चददर अपनी आोढी है |
पाव समेटे है अपनी चददर में, ना
किसी की फालतू कही है |
याद हे मुझे 365 दिन की वो राते ,
तनहाई में कटी थी वो दिनो की राते ,
रोकर भी अपने आप को चुप कराई की थी बाते ,
हर दिन नया सीखा था |
झूठे लोगो ने मुझे बहुत कुछ कहा था |
में मेहनत के दम पर खडा था |
ना किसी को कुछ कहां था |
ना किसी का नाम लिया था |
बस अपने दम पर खडा था ,
बस अपने दम पर खडा था ||
आपने बदला है ,मैने साल का अंतिम फैसला ,
आपने बदला है ,मैने साल का अंतिम फैसला ,
ना किसी से कुछ कहना ,
ना किसी से बदला लेना ||
चल पडा हूँ बस अपनी नियति पर ,
ना चहिऐ मुझे फालतू लोगों का फीका -सीका ,
365 दिन की दिन की वो राते
याद हे मुझे 365 दिन की वो बाते ,
तनहाई में कटी थी वो दिनो की राते ,
रोकर भी अपने आप को चुप कराई की थी वो बाते ,
कोई नही अगले दिन तो होगा ना सवेरा,
ये कहकर
बस पलके थी ना समेटी ,
सुबह उठकर देखा था ,तो पलके तो थी वैसे
पर टपकी थी आंखे ,
याद तो हे ना तुझे भी मेरी ,
365 दिन की वो राते |||
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