एक शाम थी , हार थक के घर आ जाती थी | पता नही चलता था कि रात कटी या दिन , मन बहुत घबराता था | दिल को बहुत सताती थी | पता नही रात कयू आ जाती थी ,
एक शाम थी , हार थक के घर आ जाती थी | पता नही चलता था कि रात कटी या दिन , मन बहुत घबराता था | दिल को बहुत सताती थी | पता नही रात कयू आ जाती थी , जिंदगी कयू रो जाती थी | आते थे सपने थके थके फिर भी मन को कयो भा जाते थे | रास नही आया तुझे तो फिर मुझे कयो पाने की सोची थी , हर शाम आती थी , थकी थकी मुझे रोने को कर जाती थी , खोये नही महफिलो में , फिर भी ये कयू चली जाती थी | हर एक शाम आती थी | कुछ पल सताती थी | आंखो मे दर्द की परत थी | कभी कभी तो ऐसी शाम आती थी , दिल चाह कर भी नींद नही आती थी | मेरी एक शाम आती थी , कभी बुखार तो कभी दर्द , और 14 तरह की बिमारी एक साल में आ गई थी ,कैसे शाम निकले एक साल की , हर महीने कुछ नई दिककत आती थी || मां आई रोटी बनाने के लिऐ पर वो शाम नही जाती थी | चाय पीकर मां की दौड लगती थी , Buy Now ✍🏻 कभी बलले उठाकर कमरे में उठ जाती थी || उममीद बहुत थी पर शाम वही बात याद आती थी ,| मासूम सी जिंदगी बनी थी कभी कभी तो शाम दिखते ही हाथ कांप जाती थी || पल पल याद है मुझे , पर आंखो की बिमारी...