मैने इज्जत की थी और
तुने रोटी भी ना दी थी |
मैने इज्जत की थी और
तुने रोटी भी ना दी थी ||
मे सब जगह जीता हूँ
और हर जगह जीत भी रहा हू ||
घमंड नही है मुझे एक पैसे का भी ,
कयोकि मैने इज्जत दी थी ||
तूने रोटी भी ना दी और
मैने अपना घर भी दे दिया था |
तूने पूछा भी ना था दर्द मेरा कभी ,
पर तूने दर्द ऐसा दे दिया था ||
उबलते पानी को घाव पर डाल दिया था ||
अकड थी बहुत तुझमे ,
की झुका देगे तुझे झूठी बातो में ,,
की झुका देगे तुझे झूठी बातो में ,
पर मैने इज्जत की थी |
और तुने रोटी भी ना दी थी |
में जीता हूँ हर जगह जगह ,
और जीत भी रहा हु ,
हारूगा नही याद है मुझे ,
कयोकि मैने इज्जत दी थी ||
कयोकि मैने इज्जत की थी ||
पुछकर - पुछकर हर बात किसी से
घर नही चलता ,
अकल नही है जिसको थोडी सी भी ,
वहाँ मर्द नही रूकता ||
कयोकि वहाँ मर्द नही रूकता ||
गंदे दिल में मन नही लगता ||
सच्ची बात में मोहबबत होती है |
सच्ची बात में मोहबबत होती है |
हर बार बात को दबाने से घर नही बसता ,
मैने कहा था उसको ,
रोका नही उसको कभी भी ,
कही पर और घर में भी ,
मैने कहा था उसको ,
टोका भी नही उसको कभी ,
फिर भी अपनी बात को उपर रखकर
चलाई ,थी उसने
चलाई ,थी उसने
कहाँ था बहुत मैने ,मान लो मेरी बात ,
नही तो जान लो गे फिर ये संसार ,
पर वो आदत से मजबूर थे ,
मजबूरी का फायदा उठाकर ,
धोखा देने में माहिर थे ||
पर मैने इज्जत की थी |
और
उसने रोटी भी ना दी थी |
मैने इज्जत की थी और
तुने रोटी भी ना दी थी ||
तंगी को ना समझो पर कोई नही ,
पर तुने तो घर ही तंग करने की सोच रखी थी ||
इज्जत कहाँ थी
तुमने ने तो अपनी किस्मत भी खुद से लिखी थी ||
इज्जत कहाँ थी
तुमने ने तो अपनी किस्मत भी खुद से लिखी थी ||
सच्चे को झूठा बनाकर कोई तो फायदा सोचा था |
मुझे अनपढ समझकर ,
अपने आप को बडा माना था ||
हक की बात कया कर लिया ,
लोगों ने ने मूर्ख ही समझ लिया था ||
पर तो ,मैने इज्जत दी थी तुझे |
और तूने रोटी भी ना दी ||||
मैने इज्जत दी थी तुझे |
पर तूने तो रोटी भी ना दी थी ||||
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